मासूम सी वो ज़िन्दगी (Masoom si wo Zindgi) | Hindi Real POETRY by Aaditya Mishra

मासूम सी वो जिंदगी न जाने क्यों ख़ामोश है ।।

कहना कुछ चाह रही पर शायद बे-होश है 
तड़प सी रही है वो शायद उसमे रोष है
पूछना वो चाह रही मेरा क्या दोष है ?
मासूम सी वो जिंदगी न जाने क्यों ख़ामोश है ।।

क्या हो गया नैतिक पतन
या तनिक भी न सोच है
पशु है वो इंसान
जो करते ऐसी मोच है
शायद इसीलिए वो जिंदगी ख़ामोश है ।।

तो...देना है अब साथ उसका लेकर जन आक्रोश है
देखना फिर उसका जो हौसलों का जोश है
चलों करें मिलकर शंखनाद रूपी यह घोष है
हो गये मिलकर खड़े अब न हम ख़ामोश है
पाओगे तुम देखना उस मासूम सी ज़िन्दगी को 
अब वो न खामोश है बल्कि है एक नयी सोच है 
है एक नयी सोच है......।।

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