चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

                  समुद्रगुप्त का पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय जिसका शासनकाल 380- 412 ई. तक था, गुप्त वंश के महानतम सम्राटों में एक अत्यंत वीर, प्रतापी व योग्य शासक था। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने बड़े भाई राम गुप्त द्वारा शकों के साथ अपमानजनक संधि का विरोध किया व सिंहासन पर आसीन हुआ।

                   चंद्रगुप्त द्वितीय ने वैवाहिक- संबंध द्वारा राजनीतिक सुदृढ़ता को स्थापित किया। इसने नाग वंश की राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह किया व उससे उत्पन्न पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से किया साथ ही उनका समर्थन प्राप्त कर गुजरात, काठियावाड़, मालवा से विदेशी शक्ति शकों को पराजित किया। इस कारण इन्हें ‘शकारी’ कहा गया व इस विजय के उपलक्ष्य में ‘विक्रमादित्य’ उपाधि धारण की। चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी द्वितीय राजधानी उज्जैन को बनाया। इसके अलावा चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र कुमारगुप्त का विवाह कदंब राजवंश में किया।

                         मैहरौली स्तंभ लेख से चंद्रगुप्त द्वितीय की वाहिक विजय का उल्लेख मिलता है जो बाह्य जाति थी। इसके अलावा पूर्वी विजय अर्थात् बंग विजय का भी उल्लेख है। इसी स्तंभ लेख में कहा गया है कि चंद्र के प्रताप से दक्षिण भी सुगंधित हो उठा जिससे इसकी दक्षिण विजय का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार चंद्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से पूर्व में बंगाल तक व उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत था।

                        इसके समय कला, साहित्य, विज्ञान, ज्योतिष में भी प्रगति हुई। इसके दरबार में नौरत्न थे जिनमें कालिदास सर्वाधिक लोकप्रिय थे। चंद्रगुप्त के अन्य नाम देवश्री, देवगुप्त, देवराज, विक्रम, सिंहचंद्र, सिंहविक्रम, अप्रतिरथ, अजितविक्रम थे। इसने परमभट्टारक, परमभागवत, महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

                       चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अश्वमेध यज्ञ किया व काशी के समीप एक अश्व मूर्ति स्थापित कराई। इसने अनेक प्रकार के सिक्के प्रचलित कराए जिनमें धनुर्धारी व सिहंता प्रकार के सिक्के प्रमुख थे।

                       इस प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय राजनीतिक एकता, आर्थिक समृद्धि, कला, साहित्य, विज्ञान, ज्योतिष अपने चरम पर पहुंची साथ ही राजा के प्रति जन विश्वास की भावना से चहुमुखी विकास हुआ इसे गुप्त काल अपने ‘स्वर्ण काल’ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

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