अशोक का धम्म
अशोक का धम्म उसके जीवन के अपने अनुभव व विभिन्न विचारकों की शिक्षाओं, विचारों से प्रेरित जीवन जीने का एक प्रभावशाली माध्यम था। इस नैतिक आचार संहिता का मुख्य उद्देश्य समस्त मानव का नैतिक उत्थान कर उनमें नवीन एकता, उत्तरदायित्व व बहुकल्याण की भावना विकसित कर शांति व सौहार्दपूर्ण संबंधों को विकसित करना था।
अपने द्वितीय स्तंभ लेख में अशोक स्वयं अपने प्रश्न ‘कियम् चु धम्मे’ ? अर्थात धम्म क्या है ? का उत्तर देते हुए कहता है कि - “अपासिनवे बहुकथाने दया दाने सचे साचवे माधवे साधवे च ” । अर्थात अल्प पाप, अधिक लोगों का कल्याण, दया(करुणा), दान(उदारता) करना, सच बोलना, पवित्र रहना, मधुरता व सज्जनता बनाए रखना धम्म है।
इसके अलावा कुछ कर्तव्य जैसे प्राणवान जंतुओं की हत्या न करना, जीवों की रक्षा करना, वृक्षों की सेवा, माता-पिता, गुरुजनों व साधुओं का सम्मान, छोटों का स्नेह आदि व्यावहारिक कर्तव्य व उग्रता, निष्ठुरता, क्रोध, घमंड, ईर्ष्या जैसे निषेधात्मक कर्तव्य भी निर्धारित किए गए।
साथ ही अशोक अपने धम्म में अल्पव्यय व अल्पसंचय की बात कर समुदायिकता पर भी जोर देता है।
अशोक ने धम्म के प्रसार हेतु धर्म- यात्रा, धर्ममहामात्यों की नियुक्ति, धम्म उपदेश आदि कार्य किये।
प्रभाव -
• मानव का नैतिक उत्थान
• नवीन एकता
• बहु कल्याण की भावना
• शांति व सौहार्दपूर्ण संबंध
• सहिष्णुता का वातावरण निर्मित
इस प्रकार अशोक का धम्म केवल प्रजा मात्र ही नहीं अपितु समस्त प्राणी जगत के कल्याण हेतु था जिसमें व्यवहारिकता, सार्वभौमिकता, सहिष्णुता, अहिंसा जैसे नैतिक गुण विद्यमान थे ।
Nice
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